भारत में LGBTQ (लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर और क्वियर) समुदाय के अधिकारों की यात्रा पिछले दो दशकों में काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है। एक ओर जहां सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसलों के जरिए समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किया और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहचान दी, वहीं दूसरी ओर समलैंगिक विवाह की मान्यता और ट्रांसजेंडर अधिकारों पर हालिया विधेयक जैसे मुद्दे समाज और कानून के बीच गहरी बहस पैदा कर रहे हैं।
कानूनी प्रगति की मुख्य उपलब्धियाँ
2014 में NALSA बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरे लिंग के रूप में कानूनी मान्यता दी और स्व-पहचान (self-identification) के अधिकार को मौलिक अधिकार माना। अदालत ने कहा कि लैंगिक पहचान व्यक्ति की गरिमा और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) से जुड़ी है।
2018 में नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ फैसले में धारा 377 भारतीय दंड संहिता को आंशिक रूप से रद्द कर वयस्कों के बीच सहमति वाले समलैंगिक संबंधों को अपराधमुक्त घोषित किया गया। इससे समुदाय को निजी जीवन में राहत मिली और भेदभाव के खिलाफ संवैधानिक सुरक्षा मजबूत हुई।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने समुदाय के लिए कुछ कल्याणकारी प्रावधान किए, जैसे शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं में आरक्षण की दिशा में प्रयास।
हालांकि, 2023 में सुप्रियो बनाम भारत संघ (समलैंगिक विवाह मामले) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देना संसद का विषय है, न कि न्यायालय का। अदालत ने कहा कि विवाह मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन LGBTQ व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव समाप्त करने की जरूरत पर जोर दिया।
वर्तमान में चल रहे प्रमुख मुद्दे
2026 में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026। इस विधेयक में 2019 के कानून में बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं, जिसमें ट्रांसजेंडर की परिभाषा को सीमित करने और स्व-पहचान के अधिकार को हटाने की बात कही गई है।
विधेयक के अनुसार अब ट्रांसजेंडर पहचान मुख्य रूप से पारंपरिक सामाजिक-सांस्कृतिक श्रेणियों (जैसे हिजड़ा, किन्नर, अरावनी) या जन्मजात जैविक भिन्नताओं तक सीमित रखी जा सकती है। स्व-पहचान की जगह चिकित्सकीय बोर्ड और जिला मजिस्ट्रेट की प्रमाणन प्रक्रिया अनिवार्य करने का प्रस्ताव है। समुदाय और छात्र संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया है। उन्होंने इसे NALSA फैसले के विपरीत और ट्रांस पुरुषों, ट्रांस महिलाओं, नॉन-बाइनरी तथा जेंडर-फ्लुइड व्यक्तियों के अधिकारों पर हमला बताया है।
समलैंगिक विवाह अभी भी कानूनी रूप से मान्य नहीं है। संयुक्त गोद लेना, उत्तराधिकार, बीमा और मेडिकल निर्णय लेने जैसे अधिकारों में भी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। कई राज्यों में अलग-अलग नीतियाँ हैं, जैसे तमिलनाडु में LGBTQIA+ कल्याण नीति पर चर्चा चल रही है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत दृष्टिकोण की कमी है।
सामाजिक चुनौतियाँ
कानूनी प्रगति के बावजूद सामाजिक स्वीकार्यता अभी भी कम है। 2025 के प्यू रिसर्च सर्वे के अनुसार, भारत में समलैंगिकता को नैतिक रूप से अस्वीकार्य मानने वालों का प्रतिशत अभी भी काफी है। परिवार, समाज और कार्यस्थल में भेदभाव, हिंसा और बहिष्कार के मामले आम हैं। ट्रांसजेंडर समुदाय को रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे ज्यादा कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।शहरी क्षेत्रों में प्राइड मार्च और जागरूकता अभियान बढ़े हैं, लेकिन ग्रामीण भारत में स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण है। कई युवा अपनी पहचान छिपाकर रहने को मजबूर हैं या परिवार द्वारा अस्वीकार किए जाते हैं।
आगे की राह
LGBTQ मुद्दे भारत की विविधता और समावेशिता की परीक्षा हैं। कुछ प्रगति हुई है, लेकिन पूर्ण समानता के लिए संसद को सक्रिय भूमिका निभानी होगी—चाहे समलैंगिक संघों की कानूनी मान्यता हो, एंटी-डिस्क्रिमिनेशन कानून हो या ट्रांसजेंडर अधिकारों में संतुलित सुधार।
समाज को समझना होगा कि लैंगिक पहचान और यौनिकता व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है, जो संविधान की गरिमा और समानता के सिद्धांतों से जुड़ी है। बिना भेदभाव के हर नागरिक को अपने अधिकारों का सम्मान मिले, यही सच्चा लोकतंत्र है।
देश दर्पण का मानना है कि जागरूकता और संवाद से ही सकारात्मक बदलाव संभव है। समुदाय के अधिकारों पर खुली चर्चा जरूरी है, ताकि भारत वास्तव में सबके लिए समान अवसरों वाला देश बने।
लेखक: देश दर्पण संपादकीय टीम (हम न नफरत फैलाते हैं, न नजरें फेरते हैं – सिर्फ सच दिखाते हैं)