27 अप्रैल 2026
आम आदमी पार्टी (AAP) के संस्थापक सदस्य और राजसभा सांसद राघव चड्ढा ने 24 अप्रैल 2026 को पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया। उनके साथ 6 और AAP राजसभा सांसद – संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल – ने भी बीजेपी में शामिल होने का ऐलान किया। दो-तिहाई बहुमत का हवाला देकर उन्होंने एंटी-डिफेक्शन कानून से बचने की कोशिश की, लेकिन सवाल ये है – क्या यह सिद्धांतों का पालन था या सत्ता के आगे घुटने टेकना?
राघव चड्ढा, जो कभी AAP की ‘ईमानदार राजनीति’ के चेहरे के रूप में जाने जाते थे, अब अचानक ‘राइट मैन इन रॉन्ग पार्टी’ बन गए। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने AAP पर ‘टॉक्सिक वर्क एनवायरनमेंट’, ‘मूल्यों से भटकने’ और ‘अपराधों में शामिल न होने’ का आरोप लगाया। लेकिन सच तो ये है कि चड्ढा AAP में डिप्टी लीडर पद से हटाए जाने के कुछ ही दिन बाद यह कदम उठा रहे हैं। क्या यह महज संयोग है? या फिर केजरीवाल के खिलाफ नाराजगी का नतीजा?
सत्ता की चाल या राजनीतिक विश्वासघात?
AAP के संस्थापक सदस्य होने का दावा करते हुए चड्ढा ने 15 साल की ‘खून-पसीने’ की मेहनत का जिक्र किया। लेकिन जब पार्टी ने उन्हें हटाया, तो उन्होंने तुरंत बीजेपी के साथ ‘मर्जर’ का रास्ता चुन लिया। यह ‘मर्जर’ नाम का खेल तो पुराना है – ऑपरेशन लोटस का नया संस्करण। बीजेपी ने इन्हें पार्टी मुख्यालय पर बधाई दी, नितिन नवीन ने स्वागत किया। राजसभा में NDA की ताकत बढ़ गई, BJP की संख्या 113 हो गई। लेकिन AAP के लिए यह घातक झटका है। दिल्ली, पंजाब और 2027 पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी की रीढ़ तोड़ दी गई।
चड्ढा कहते हैं कि AAP ‘ईमानदार राजनीति’ से भटक गई। लेकिन क्या बीजेपी, जिसके खिलाफ AAP ने सालों तक भ्रष्टाचार, क्रोनी कैपिटलिज्म और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगाए, अब अचानक ‘पॉजिटिव पॉलिटिक्स’ का प्रतीक बन गई? चड्ढा ने खुद कहा – “मैं राजनीति में करियर बनाने नहीं आया था।” तो फिर यह करियर-बदलाव क्यों? क्या शादी के बाद परिवार के बीजेपी कनेक्शन ने असर डाला? या फिर दिल्ली चुनावों में AAP की हार के बाद सत्ता का रुख बदल गया?
जनता का गुस्सा और सोशल मीडिया का बवाल
चड्ढा के इस कदम के बाद सोशल मीडिया पर भारी बवाल मचा। उनके इंस्टाग्राम फॉलोअर्स में एक मिलियन की गिरावट आई। युवा (Gen Z) जो AAP की ‘परिवर्तन’ की बात पर भरोसा करते थे, अब धोखा महसूस कर रहे हैं। एक यूजर ने लिखा – “नाम ही चड्ढा है, खिसकना ही था।” दूसरा बोला – “सिद्धांत बेच दिए सत्ता के लिए।” परिणीति चोपड़ा के पुराने बयान भी वायरल हो रहे हैं। अब पति बीजेपी में, तो क्या कहेंगी?
AAP नेता संजय सिंह ने चड्ढा पर ‘देशद्रोह’ जैसा आरोप लगाते हुए डिसक्वालिफिकेशन की मांग की। लेकिन कानूनी चालाकी से बचकर चड्ढा और उनके साथी सांसद बरकरार रह गए। यह दिखाता है कि राजनीति में ‘दो-तिहाई’ का खेल कितना आसान हो गया है।
राघव चड्ढा: सच्चे आम आदमी या सत्ता का खिलौना?
राघव चड्ढा ने AAP को दिल्ली और पंजाब में मजबूत बनाने में भूमिका निभाई। लेकिन आज वही चेहरा सत्ता की भूख का प्रतीक बन गया। क्या यह ‘ईमानदार राजनीति’ का अंत है? या फिर साबित होता है कि बड़े-बड़े दावे करने वाले नेता भी अंत में ‘सिस्टम’ का हिस्सा बन जाते हैं?
यह कदम AAP के लिए सबक है। केजरीवाल को अब अपनी पार्टी को फिर से मजबूत करना होगा। लेकिन राघव चड्ढा के लिए एक सवाल हमेशा रहेगा – क्या सत्ता पाने के लिए अपने 15 साल के संघर्ष को बेचना सही था?
आप क्या सोचते हैं? कमेंट में बताएं – राघव चड्ढा का यह फैसला सही था या धोखा?
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