23 अप्रैल 2026 को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 152 सीटों पर रिकॉर्ड 92.38% मतदान हुआ। यह आंकड़ा न सिर्फ 2021 के चुनावों से बल्कि पूरे देश के इतिहास में दुर्लभ है। सुबह से शाम तक लंबी कतारें, महिलाओं-युवाओं का उत्साह और ग्रामीण इलाकों में भारी भीड़ ने साफ संकेत दिया कि बंगाल की जनता इस बार चुपचाप नहीं बैठने वाली। लेकिन सवाल यह है – इतनी भारी वोटिंग का फायदा किसे मिलेगा? ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को या बीजेपी को? पिछले चुनावों के आंकड़ों, राजनीतिक विश्लेषकों की राय और मैदान की हकीकत से समझते हैं।
सबसे पहले SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) का मुद्दा। चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया में करीब 91 लाख वोटरों के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए। मुर्शिदाबाद, उत्तर 24 परगना, पश्चिम बर्दवान जैसे जिलों में सबसे ज्यादा कटौती हुई। तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि यह कटौती मुस्लिम और अल्पसंख्यक वोटरों को निशाना बनाकर की गई, जो पारंपरिक रूप से टीएमसी के पक्ष में वोट करते हैं। ममता बनर्जी ने खुद इसे “जनता के अधिकारों पर हमला” बताया और कहा, “इतनी वोटिंग इसलिए हुई क्योंकि लोग बीजेपी की साजिश के खिलाफ अपना गुस्सा दर्ज करा रहे हैं।” राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी जैसी पत्रकार भी मानती हैं कि “ममता की लड़ाकू छवि और कल्याण योजनाओं (लक्ष्मीर भंडार, कन्याश्री, स्वास्थ्य साथी) ने लोगों को बूथ तक खींचा।
पिछले चुनावों का सबक
2021 के विधानसभा चुनाव में पूरे बंगाल में औसतन 82% के करीब वोटिंग हुई थी। पहले चरण की 152 सीटों पर टीएमसी ने 92 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी को सिर्फ 59 मिलीं। उस समय भी भारी मतदान टीएमसी के पक्ष में गया था। कारण साफ था – टीएमसी के पास ग्रामीण और अल्पसंख्यक वोटरों का मजबूत नेटवर्क है। ये वोटर वादे-वायदों से ज्यादा अपनी पार्टी के प्रति वफादार होते हैं और बूथ तक जरूर पहुंचते हैं।
बीजेपी ने 2016 में सिर्फ 10% वोट शेयर से शुरू करके 2021 में 38% तक पहुंचा, लेकिन सीटों में तब्दील नहीं कर पाई। वोट एफिशिएंसी टीएमसी के पास ज्यादा थी। इस बार भी पहले चरण की 152 सीटों में से ज्यादातर टीएमसी की मजबूत पकड़ वाली हैं। 91 लाख नाम काटने के बावजूद अगर 92% लोग निकलकर वोट डाल रहे हैं, तो इसका मतलब है कि बचे हुए वोटर (जिनमें टीएमसी समर्थक बहुल हैं) और ज्यादा जोश से निकले। यानी बीजेपी की “वोटर लिस्ट साफ-सफाई” वाली रणनीति उल्टी पड़ गई।
एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं?
वरिष्ठ पत्रकार नीरेंद्र नागर (2021 के संदर्भ में) कह चुके हैं कि “80% से ज्यादा वोटिंग का फायदा सत्ताधारी पार्टी को ही मिलता है, क्योंकि उसके पास कमिटेड वोटरबैंक होता है।” इस बार का 92% आंकड़ा उससे भी आगे है। कई विश्लेषक (जैसे न्यूज18 और द हिंदू के रिपोर्ट्स में) मान रहे हैं कि SIR विवाद ने अल्पसंख्यक और गरीब वर्गों को एकजुट कर दिया। बीजेपी की CAA-NRC वाली पुरानी छवि और “बांग्लादेशी घुसपैठिए” वाले बयानों ने बंगाल की अस्मिता को चुनौती दी। ममता ने इसे “बंगाल बचाओ” का मुद्दा बना दिया। परिणाम – महिलाएं, युवा और मुस्लिम बहुल इलाकों में रिकॉर्ड टर्नआउट।
बीजेपी का दावा है कि SIR से फर्जी वोटर हटे, लेकिन हकीकत यह है कि कटौती के आंकड़े उन सीटों पर ज्यादा हैं जहां 2021 में टीएमसी की जीत का मार्जिन छोटा था। 44 सीटों पर कटौती 2021 के मार्जिन से ज्यादा थी। यह संयोग नहीं, बल्कि रणनीति लगती है। लेकिन जनता ने जवाब दे दिया
भारी मतदान से किसे मिलेगा फायदा?
साफ है – ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस को।
- पहला चरण टीएमसी की 92 सीटों वाला है। भारी टर्नआउट यहां उनकी जीत को और मजबूत करेगा।
- बीजेपी के लिए यह फेज “मेक या ब्रेक” था, लेकिन वोटर दमन की कोशिश ने उल्टा असर किया।
- 2021 की तरह इस बार भी हाई वोटिंग टीएमसी की वोट एफिशिएंसी बढ़ाएगी।
बीजेपी की रणनीति – वोटर लिस्ट में काट-छांट, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और केंद्र की योजनाओं का प्रचार – बंगाल की जनता को पसंद नहीं आई। बंगाल हमेशा से अस्मिता, भाषा और कल्याण की राजनीति का केंद्र रहा है। ममता ने इसे बखूबी भुनाया।
निष्कर्ष
92% वोटिंग कोई संयोग नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जीत है। यह उन लाखों वोटरों का जवाब है जिनके नाम काटकर बीजेपी सत्ता हथियाना चाहती थी। पिछले चुनावों का इतिहास गवाह है – जब जनता एकजुट होती है, तो तृणमूल की जड़ें और मजबूत हो जाती हैं। 4 मई को जब नतीजे आएंगे, तो बंगाल एक बार फिर साबित करेगा कि यहां “परिवर्तन” का नाम ममता बनर्जी है, न कि बीजेपी की दिल्ली वाली एजेंडा। देश दर्पण की रिपोर्ट: सच्चाई की आवाज, बिना किसी समझौते के।
लेखक: देश दर्पण संपादकीय टीम (हम न नफरत फैलाते हैं, न नजरें फेरते हैं – सिर्फ सच दिखाते हैं)