नई दिल्ली, 23 दिसंबर 2025: दादरी लिंचिंग मामले में मोहम्मद अखलाक के परिवार ने अदालत में एक ऐसा भावुक सवाल उठाया है जो न्याय व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े करता है। ‘क्या लाठी से पीटकर किसी को मार डालना छोटा अपराध है?’ – यह सवाल परिवार ने उत्तर प्रदेश सरकार की उस याचिका के खिलाफ दिया, जिसमें आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की मांग की गई थी। यह मामला 2015 का है, लेकिन आज भी इसकी गूंज समाज में महसूस की जा रही है, खासकर तब जब सरकार द्वारा केस वापसी की कोशिशें तेज हो गई हैं।
पृष्ठभूमि: क्या हुआ था 2015 में?
28 सितंबर 2015 की रात को उत्तर प्रदेश के दादरी इलाके में मोहम्मद अखलाक और उनका परिवार घर में सो रहा था। अचानक एक भीड़ ने उनके घर पर हमला कर दिया। अफवाह थी कि उनके घर में गोमांस रखा है। भीड़ ने लाठियों, तलवारों और पिस्तौलों से हमला किया, जिसमें अखलाक की मौत हो गई और उनका बेटा दानिश गंभीर रूप से घायल हो गया। यह घटना भारत में लिंचिंग की शुरुआती बड़ी घटनाओं में से एक थी, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, हमलावरों ने घर में घुसकर अखलाक को बुरी तरह पीटा था।
इस मामले में 19 लोग आरोपी बनाए गए थे, लेकिन अब उत्तर प्रदेश सरकार इनके खिलाफ मुकदमा वापस लेने की कोशिश कर रही है। सरकार का तर्क है कि हमले में कोई घातक हथियार नहीं इस्तेमाल हुआ, कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी, और यह एक ‘आकस्मिक घटना’ थी। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकार ने पहले इन तर्कों का विरोध किया था, लेकिन अब इन्हीं को आधार बनाकर केस वापस लेना चाहती है।
परिवार की भावुक दलील: न्याय की गुहार
अखलाक के परिवार ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया है। अदालत में सुनवाई के दौरान परिवार ने कहा कि अगर लाठियों से पीटकर मार डालना छोटा अपराध है, तो क्या न्याय व्यवस्था में हत्या की परिभाषा बदल गई है? टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, परिवार ने पूछा कि क्या ऐसी घटनाएं बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है? उन्होंने भावुक होकर कहा कि यह न सिर्फ उनके परिवार के लिए अन्याय है, बल्कि पूरे समाज के लिए खतरनाक संदेश है। परिवार की पत्नी ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है, जिसमें कहा गया है कि केस वापसी से और लिंचिंग की घटनाएं बढ़ सकती हैं। आउटलुक इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट में परिवार की इस चिंता को विस्तार से बताया गया है।
परिवार ने यह भी कहा कि सरकार का यह कदम संविधान और कानून के खिलाफ है। लेफ्ट व्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, परिवार ने अदालत से पूछा कि क्या मुकदमा बीच में ही वापस लिया जा सकता है, खासकर जब सबूत मौजूद हैं?
अदालत का फैसला: सरकार की याचिका खारिज
आज ही उत्तर प्रदेश की एक अदालत ने सरकार की केस वापसी की याचिका को खारिज कर दिया है। लाइव लॉ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं और मुकदमा जारी रहेगा। यह फैसला परिवार के लिए राहत की सांस है, लेकिन संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। द वायर की रिपोर्ट में बताया गया है कि सुनवाई के दौरान जज ने भी सरकार के तर्कों पर सवाल उठाए थे।
क्या हैं व्यापक प्रभाव?
यह मामला सिर्फ एक परिवार की लड़ाई नहीं है, बल्कि भारत में लिंचिंग और अल्पसंख्यक अधिकारों का प्रतीक बन गया है। डेक्कन हेराल्ड की संपादकीय में पूछा गया है – ‘तो क्या अखलाक की हत्या किसी ने नहीं की?’ सबरंग इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार का यह कदम दस साल बाद भी न्याय को कमजोर कर रहा है, जो संविधान के खिलाफ है। एडेम की रिपोर्ट में इसे न्याय का खुला विश्वासघात बताया गया है।
अखलाक का परिवार कहता है कि वे न्याय की लड़ाई नहीं छोड़ेंगे। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि यह उनके लिए व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए है। समाज को सोचना होगा कि क्या ऐसी घटनाओं को भुलाया जा सकता है, या न्याय की मांग जारी रहनी चाहिए।
लेखक: देश दर्पण संपादकीय टीम (हम न नफरत फैलाते हैं, न नजरें फेरते हैं – सिर्फ सच दिखाते हैं)